Saturday, December 20, 2014

सन्ध्योपासना

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वेद ने सन्धि वेला में सन्ध्या का विधान किया है। प्रातःकाल और सायंकाल दोनों सन्धिवेलाओं में परमात्मा का ध्यान करना चाहिए। 

वेदमन्त्र कहता हैः----

"उप त्वाग्ने दिवे दिवे दोषावस्तर्धिया वयम्।
नमो भरन्त एमसि ।। (ऋग्वेदः---1.1.7)

हे प्रकाशस्वरूप ! प्रतिदिन प्रातः और सायं अपनी बुद्धि से हम उपासक जन नमस्कार को धारण करते हुए आपके समीप प्राप्त होते हैं।

"तस्मादहोरात्रस्य संयोगे सन्ध्यामुपासीत,
उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन् ।।"
(षड्विंश ब्राह्मण, प्रपा. 4, खण्ड-5)

इसलिए दिन और रात के संयोग में अर्थात् सूर्य के उदय और अस्त होते समय सन्ध्योपासना करें।

मनु महाराज ने लिखा हैः---

"ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् ।
कायाक्लेशाँश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च।।"
(मनु. 4.92)

ब्राह्ममुहूर्त में उठे, धर्म, अर्थ, शरीर के रोग, उनके मूल का चिन्तन करें, वेद-तत्त्वार्थ अर्थात् ईश्वर का ध्यान करें।

"उत्थायावश्यकं कृत्वा कृतशौचः समाहितः।
पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्स्वकाले चापरां चिरम्।।"
(मनु. 4.93)

उठकर आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर, शौच-स्नान आदि करके प्रातः तथा सायं दोनों समय की सन्ध्या में चिरकालपर्यन्त जप करता रहे।

सन्ध्या का महत्त्व दर्शाते हुए कहा गया हैः----

"न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम्।
स शूद्रवत् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ।।"
(मनु.2.103)

जो प्रातःकालीन और सायंकालीन सन्ध्या नहीं करता, वह सब द्विजकर्मों से शूद्र के समान बहिष्कार के योग्य है।

इसी प्रकार कहा गया हैः----

"सन्ध्या येन न विज्ञाता सन्ध्या येनानुपासिता।
स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ।।"
(मनु. )

जिसने सन्ध्या नहीं जानी और जिसने सन्ध्या का अनुष्ठान नहीं किया, वह सब द्विजकर्मियों से शूद्र के समान बहिष्कार करने के योग्य है।

"पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत् सावित्रीमार्कदर्शनात्।
पश्चिमां तु समासीनः सम्गृक्षविभावनात् ।।"
(मनु. 2.101)

प्रातःकाल की सन्ध्या और गायत्री का जप सूर्य के दर्शन होने तक करे और सायंकालीन सन्ध्या तब तक करे जब तक सितारे आकाश में भली-भाँति झलकने लगें।

"ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाप्मुयुः।
प्रज्ञां यशश्च कीर्तिं च ब्रह्मवर्चसमेव च ।।"
(मनु.4.94)

ऋषियों ने चिरकालपर्यन्त सन्ध्या करने से बुद्धि, विद्या, यश, कीर्ति तथा ब्रह्मतेज को प्राप्त किया है।

मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम भी सन्ध्या किया करते थे, ऐसा रामायण से सुस्पष्ट हैः---

"कौशल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्त्तव्य दैवमाह्निकम्।।
तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ ।
स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जेपतुः परमं जपम्।।"
(रामायण, बा.कां. 23.3-4)

महर्षि विश्वामित्र जी अपने यज्ञ की विघ्न-निवृत्ति के लिए श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण जी को लेकर चले तो रात्रि व्यतीत करने के लिये एक स्थान पर ठहरे। प्रातःकाल उन्होंने श्रीराम को पुकारा और कहा, "कौशल्या की सन्तान राम ! प्रातःकाल की सन्ध्या का समय हो गया है। तुम उठो और सन्ध्या-यज्ञादि करो।"
उस ऋषि के परमोदार वचनों को सुनकर श्रीरामचन्द्र उठे और स्नान करके उन्होंने परम जप अर्थात् गायत्री का जाप किया।

माता सीता जी भी सन्ध्या करती थीं, ऐसा भी रामाय़ण से पता चलता है। हनुमान् जी जब सीता को ढूँढते हुए अशोकवाटिका में पहुँचे तो सोचने लगे कि सीता जी यदि जीवित होंगी तो सन्ध्या करने के लिए अवश्य ही नदी के किनारे आएँगी---

"सन्ध्याकालमनाः श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी।
नदीं चेमां शुभजलां सन्ध्यार्थे वरवर्णिनी ।।
यदि जीवति सा देवी ताराधिनिभानना ।
आगमिष्यति सावश्यमिमां शीतजलां नदीम् ।।"

श्री हनुमान् जी सोच रहे हैं कि यह सन्ध्या का समय है, सन्ध्या में मन लगाने वाली और तपे हुए सोने के समान शोभावाली जनक कुमारी सुन्दरी सीता सन्ध्याकालिक उपासना के लिए इस पुण्यसलिला नदी के तट पर अवश्य पधारेंगी। यदि चन्द्रमुखी सीता देवी जीवित हैं तो वे इस शीतल जलवाली सरिता के तट पर अवश्य पदार्पण करेंगी।

इसी प्रकार महाभारत के अनुसार योगेश्वर श्रीकृष्ण भी सन्ध्या-उपासना किया करते थेः---

"अवतीर्य रथात् तूर्णं कृत्वा शौचं यथाविधि ।
रथमोचनमादिश्य सन्ध्यामुपविवेश ह ।।"
(महाभारत, उद्योगपर्व-84.21)

जब सूर्यास्त होने लगा, तब श्रीकृष्ण शीघ्र ही रथ से उतरकर, घोडों को रथ से खोलने की आज्ञा देकर, शौच-स्नान करके विधिपूर्वक सन्ध्योपासना करने लगे।