Thursday, December 18, 2014

ब्रह्म व आत्मा

तमेव विद्वान् न विभाय मृत्योः।" (अथर्ववेदः--10.4.8.44)

अर्थः---उस ब्रह्म व आत्मा को जान लेने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।

मनुष्य चक्की के दो पाटों की तरह है। उसकी एक तरफ परमात्मा है और दूसरी तरफ प्रकृति है, संसार है। संसार में, प्रकृति में त्रैविध्य दुःख है। मनुष्य संसार से डरता रहता है। इससे बचने का एक ही उपाय है--परमात्मा। जो एक परमात्मा से डर जाता है, वह अनन्त जीवों और संसार से नहीं डरता, किन्तु जो एक परमात्मा से नहीं डरता, वह संसार से डरता रहता है।

परमात्मा से डरने का अभिप्राय यह नहीं है कि वह हमारा शत्रु है, अपितु उससे डरने का अभिप्राय है कि यदि हम गलत कार्य करेंगे तो उसका फल अवश्य भोगना पडेगा, जो दुःखदायी होगा। दूसरी तरफ डरने से यह भी अभिप्राय है कि हम सही कार्य करें। जो परमात्मा से डर गया तो वह गलत कार्य नहीं करेगा और जो गलत कार्य नहीं करता वह किसी से नहीं डरता। यह स्वाभाविक बात है। उसे यह पता है कि आत्मा अजर-अमर है, अतः वह मरने से नहीं डरता। जिसको अपने प्राण से भय नहीं, उसे संसार से कोई डर नहीं।

परमात्मा को जानने के लिए उसके पास जाना ही पडेगा। उसके पास जाने के लिए सही उपाय योग है। योगी निर्भय ही होता है। उसे मृत्यु से डर नहीं लगता। योगी के हृदय में सभी के प्रति प्रेम व स्नेह होता है। इसलिए उसे किसी कोई डर नहीं। इसलिए योग करें और निर्भय रहे।