Saturday, December 20, 2014

गीता-उपदेश

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"कर्षयन्तः   शरीरस्थं    भूतग्रामममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ।।"
(गीता--17.6)

अन्वयः--(ये) अचेतसः शरीरस्थम् भूतग्रामम् अन्तःशरीरस्थम् माम् च एव कर्षयन्तः (तपः तप्यन्ते) तान् आसुर-निश्चयान् विद्धि ।

पदार्थः---(अचेतसः) अचेतन से (शरीरस्थम्) शरीर में स्थित (भूतग्रामम्) पञ्चतत्त्वादि अंगों को, (अन्तःशरीरस्थम्) हृदय में स्थित (माम्) मुझको परमात्मा को, (च) और, (एव) ही, (कर्षयन्तः) खिंचते है, चोरी करते हैं, ((तान् ) उनको, (आसुर-निश्चयान्) आसुर निश्चय (वृत्ति, स्वभाव) वाले को, (विद्धि) जानो ।

भावार्थः----जो विवेक-शून्य लोग परमात्मा के दिए हुए पृथिवी, अप्, तेज आदि शरीरस्थ भूतों को व्यर्थ उलटे मार्ग में घसीटते (ले जाते)  हैं और मैं जो महाभारत-साम्राज्य की स्थापनार्थ उनके अन्दर प्रविष्ट होकर मानव-मात्र के कल्याण के लिए उनसे समय शक्ति का दान माँगता है हूँ, वे प्रभु की तथा मुझ सरीखे प्रभु-भक्तों की चोरी करते हैं तथा प्रभु का और प्रभु-भक्तों का माल न जाने कहाँ-कहाँ घसीट ले जाते हैं, उन सबको आसुर निश्चय वाला जान ।

भाव यह है कि विषय-वासनाओं की तृप्ति के लिए लोग कम घोर तप नहीं करते है, कम कष्ट सहन नहीं करते। यदि उतना ही तप वे प्रभु की भक्ति अथवा तदर्थ प्रभु-भक्तों के अनुकरण के लिए करें तो विश्व का कल्याण हो जावे।

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लौकिक संस्कृत गीता-उपदेश 

"कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ।।"
(गीता--17.6)

अन्वयः--(ये) अचेतसः शरीरस्थम् भूतग्रामम् अन्तःशरीरस्थम् माम् च एव कर्षयन्तः (तपः तप्यन्ते) तान् आसुर-निश्चयान् विद्धि ।

पदार्थः---(अचेतसः) अचेतन से (शरीरस्थम्) शरीर में स्थित (भूतग्रामम्) पञ्चतत्त्वादि अंगों को, (अन्तःशरीरस्थम्) हृदय में स्थित (माम्) मुझको परमात्मा को, (च) और, (एव) ही, (कर्षयन्तः) खिंचते है, चोरी करते हैं, ((तान् ) उनको, (आसुर-निश्चयान्) आसुर निश्चय (वृत्ति, स्वभाव) वाले को, (विद्धि) जानो ।

भावार्थः----जो विवेक-शून्य लोग परमात्मा के दिए हुए पृथिवी, अप्, तेज आदि शरीरस्थ भूतों को व्यर्थ उलटे मार्ग में घसीटते (ले जाते) हैं और मैं जो महाभारत-साम्राज्य की स्थापनार्थ उनके अन्दर प्रविष्ट होकर मानव-मात्र के कल्याण के लिए उनसे समय शक्ति का दान माँगता है हूँ, वे प्रभु की तथा मुझ सरीखे प्रभु-भक्तों की चोरी करते हैं तथा प्रभु का और प्रभु-भक्तों का माल न जाने कहाँ-कहाँ घसीट ले जाते हैं, उन सबको आसुर निश्चय वाला जान ।

भाव यह है कि विषय-वासनाओं की तृप्ति के लिए लोग कम घोर तप नहीं करते है, कम कष्ट सहन नहीं करते। यदि उतना ही तप वे प्रभु की भक्ति अथवा तदर्थ प्रभु-भक्तों के अनुकरण के लिए करें तो विश्व का कल्याण हो जावे।