Thursday, December 18, 2014

सत्य सनातन वैदिक धर्म

"न जातु कामान्न भयान्न लोभात्, धर्मं त्यजेत् जीवितस्यापि हेतोः।
धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ।।"
(महाभारत--5.40.11)

अर्थः---किसी अवस्था में भी काम और लोभ के वशीभूत होकर अथवा भय से भी संत्रस्त होकर तथा मृत्यु का संकट उपस्थित होने पर भी धर्म का परित्याग न करें। जीवात्मा अमर है और धर्म भी शाश्वत है। सुख-दुःख और दूसरे अन्यान्य कारण सब अनित्य है।

"स्वधर्मः श्रेयान्" जब उपनिषद् ऐसी उत्तम बात कह रहा है तब निःसन्देह कोई बात तो होगी जिससे कहा जा रहा है कि अपना धर्म श्रेष्ठ है। धर्म को चाहे गुण समझे चाहे अध्यात्म, दोनों परिस्थितियों में इसका त्याग नहीं किया जा सकता।

आजकल देखने में आता है कि कोई व्यक्ति नाम, रूप, कुल और स्वभाव से तो भारतीय दिखता हैं, किन्तु बहुत बाद में पता चलता है कि वह ईसाई या मुसलमान है।

जब 12 वर्षीय धर्मवीर हकीकत राय को कहा गया कि तुम मुसलमान बन तो तेरी जान बच सकती है तो दोनों भाईयों ने मुसलमान बनने से मना कर दिया।

इन दोनों को दीवार में चिनवाया जाने लगा। जब दीवार छोटे भाई की गर्दन तक आ गई, तब बडा भाई रोने लगा।

छोटे ने फटकारते हुए कहा, "कायर कहीं का, मृत्यु से डर गया।"

बडा भाई रोते हुए बोला, "नहीं मेरे भाई, मैं मृत्यु से नहीं डर रहा हूँ, बल्कि इस बात से दुःखी हूँ कि जब बलिदान की बात आएगी तो तुम्हारा नाम बलिदानों की सूची में मुझसे पहले होगा, क्योंकि तुम छोटे होने के कारण मुझसे पहले शहीद हो रहे हो। बस, इसी कारण से मैं रो रहा हूँ।"

आज कितने लोग हैं जो धर्म के बलिदान की बात करते हैं। आज केवल पैसे के लोभ में लोग धर्म बदल रहे हैं।

ऋषि की बात पर ध्यान दें कि वे कह रहे हैं कि ना तो कामना से, ना तो भय से, ना तो लोभ से और ना तो मृत्यु से धर्म का परित्याग करें।

यह जीवन क्या है, अनित्य है, शाश्वत तो केवल धर्म है।