Thursday, December 18, 2014

गीता-उपदेश

!!!!----: गीता-उपदेश :----!!!!
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नैष्कर्म्य-कर्म का अर्थः---
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"यज्ञार्थात्कर्मणोsन्यत्र लोकोsयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ।।"
(गीता--3.9)

अन्वयः---यज्ञार्थात् कर्मणः अन्यत्र अयम् लोकः कर्मबन्धनः, हे कौन्तेय, त्वं मुक्तसंगः तदर्थम् कर्म समाचर।

शब्दार्थः-----(अयम्) यह, (लोकः) संसार, (यज्ञार्थात्) सृष्टियज्ञ की प्रवत्ति, पञ्चमहायज्ञ के कर्म, (अन्यत्र) विन,(कर्मबन्धनः) कर्म बन्धन है जिसका वह, (कौन्तेय) कुन्ती के पुत्र, (तदर्थम्) यज्ञ के लिए,(कर्म) नियत नित्य करने योग्य कर्म स्ववर्ण के अनुसार, (मुक्तसंगः) मेरा ही कर्म और मैं ही उसका भोक्ता, इस लक्षण से युक्त संग, (समाचर) अच्छी तरह से व्यवहार करो।

अर्थः---हे कौन्तेय, यज्ञनिमित्तक कर्म से अन्यत्र और कोई कर्म करे तो मनुष्य कर्म-बन्धन में पड जाता है। अतः "उस कर्म के बदले में क्या पारितोषिक मिलेगा" इस आसक्ति से रहित होकर उसके निमित्त कर्म कर।

विशेष-विवरणः----
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यहाँ यह पहले जान लेना आवश्यक है कि यज्ञ नाम किसका है ? प्रायः लोग अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त यज्ञ-रूपकों को यज्ञ समझते हैं। यह भयंकर भूल है। इनका नाम तो द्रव्य-यज्ञ है। श्रीकृष्ण का उद्देश्य है ज्ञान-यज्ञ। फिल ज्ञानयज्ञ भी अधूरा है। वह तो कर्म से पूरा होता है। इसीलिए कहा हैः---"कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः" (गीता---3.8) परन्तु पहले तो यह समझना है कि यह द्रव्य-यज्ञ वस्तुतः यज्ञ है ही नहीं। यह तो काव्य है। तब आप कहेंगे कि क्या ये अग्निहोत्रादि कर्म तुच्छ है ? तो मैं पूछूँगा कि क्या काव्य तुच्छ है ? इन अग्निहोत्रादि कर्मों का मूल्य उतना ही है जितना काव्य का। न उससे कम न उससे अधिक। वाल्मीकि-रामायण काव्य है, क्या वह तुच्छ है ? काव्य का उद्देश्य हैः---

"रामादिवत् प्रवर्तितव्यम् न रावणादिवत्।"

किन्तु क्या रामायण पढ लेने मात्र से उद्देश्य-सिद्धि हो गई ? कदापि नहीं। जब तक रामायण में यह पढकर कि....

"रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाए पर वचम न जाई।।"

मनुष्य वचन पर दृढ रहना नहीं सीख जाते तब तक काव्य का प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ। इसी प्रकार अग्निहोत्र द्वारा जब तक हम यह सीख नहीं जाते कि...

"जिस प्रकार समिधा स्थूल अग्नि के लिए अपने आपको अर्पण करके दीप्ति उत्पन्न करती है, इसी प्रकार दीक्षा और तप रूप अग्नि के अर्पण करके मनुष्य भी जीवन का उद्देश्य पूर्ण करता है।"

तब तक अग्निहोत्र का कुछ लाभ नहीं। ये जो यज्ञों में नाना प्रकार के पशु आये हैं, ये रूपक के पात्र मात्र हैं। इसीलिए यजुर्वेद (39.4) में आया हैः---

"पशूनां रूपम् अशीय"
हे प्रभो, आपकी कृपा से मैं पशुओं के शुभ गुणों का रूप अपने अन्दर धारण करूँ।

दीक्षा तथा तप को यजुर्वेद (4.7) में अग्नि कहा गया हैः----

"दीक्षायै तपसे अग्नये स्वाहा।"

इसीलिए शतपथ-ब्राह्मण (11.3.1.6) में अग्निहोत्र को स्पष्ट शब्दों में काव्य कहा हैः----"तदस्य काव्यं तथा संततोअग्निभिरिति।"

अत एव ये अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त यज्ञ तो यज्ञरूपक हैं। अग्निहोत्र सत्य के श्रद्धा में हवन का रूपक हैः---"तेज एव श्रद्धा सत्यमाज्यम्।" (शतपथ-ब्राह्मणः--11.3.1.1)

इसी प्रकार अश्वमेध राष्ट्र का रूपक हैः---"राष्ट्रं वा अश्वमेधः" (शतपथ-ब्राह्मणः--13.1.6.3)

अब प्रश्न उठता है कि यदि अग्निहोत्र से अश्वमेध-पर्यन्त यज्ञरूपक हैं तो यज्ञ किसका नाम है ? इसका उत्तर व्याकरण-शास्त्र से लीजिए। यज्ञ शब्द "यज" धातु से बना है। यज्ञ के तीन अर्थ हैं----देवपूजा, संगतिकरण और दान।

वस्तुतः संगतिकरण ही यज्ञ है। देवपूजा और दान से ही संगतिकरण होता है। इस संसार में जितने भी संघटन हैं, सब लेन-देन का परिणाम है। देने वालों को देव कहते हैं---"देवो दानाद्वा" (निरुक्तः--4.15) अब जब देव कुछ देते हैं तो लेने वाला बदले में उनकी पूजा करता है। सो कुटुम्ब से लेकर मानव-राष्ट्र तक जितने संघटन हैं, वे यज्ञ हैं और उनमें परस्पर व्यवहार कैसा होना चाहिए, यह दिखाने वाले रूपकों का अर्थात् अग्निहोत्रादि का नाम इसलिए यज्ञ है कि वे वास्तविक यज्ञ का अभ्यास कराते हैं। इन यज्ञों का वास्तविक यज्ञों से वही सम्बन्ध है, जो युद्ध से परेड का। परेड के बिना कोई सेना युद्ध नहीं जीत सकती। परन्तु परेड का युद्ध नकली युद्ध है। सिखाने का साधन मात्र है। असली यज्ञ तो जड देवताओं की जड-पूजा तथा चेतन-देवताओं की चेतन-पूजा का नाम है।