Thursday, December 18, 2014

मृत्युञ्जय

हम मृत्यु से ऐसे छूट जायें कि जैसे पका हुआ खरबूजा लता-बन्धन से छूट जाता है। खरबूजे की यह विशेषता है कि जब वह पक जाता है तब वह बेल से स्वयमेव छूट जाता है। पके हुए खरबूजे की भाँति मृत्यु से कैसे छूटे ? मनुष्य को ऐसी स्थिति कैसे प्राप्त हो ? क्या उपाय किए जाएँ जिनसे मनुष्य को यह अवस्था प्राप्त हो जाये ?

यह अवस्था जीवन की चरम साधना है। यदि यह अवस्था मनुष्य को प्राप्त हो जाये तो यही मृत्यु पर विजय है।

मृत्यु पर विजय का यह अर्थ नहीं है कि मनुष्य को मृत्यु प्राप्त ही न हो, अपितु मृत्यु पर विजय का अर्थ है कि जब मनुष्य की मृत्यु आए तब वह घबराये नहीं, उसे हँसते हुए स्वीकार करें। जीवन की यह एक बहुत बडी साधना है।

प्रश्न यह है कि यह कैसे प्राप्त हो ? वे कौन-से उपाय हैं, जिनसे मनुष्य इस उच्च-स्थिति को प्राप्त हो ?

मृत्यु का भय मनुष्य को न सताये, शास्त्र ने यत्र-तत्र इसके उपाय बताये हैं। इन उपायों को यदि मनुष्य हृदयंगम कर ले तो फिर मृत्यु उसके लिए भयावह नहीं रहती।

सबसे पहला उपाय यह है कि मनुष्य अपने हृदय में यह बिठा ले कि आत्मा अमर है और शरीर नाशवान्। यजुर्वेद में कहा हैः----

"वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।" (यजुर्वेदः--40.15)

शरीरों में आवागमन करने वाला आत्मा अमर है और यह शरीर नाशवान् है। इस शाश्वत तथ्य को जिसने अपने मनोमस्तिष्क में बिठा लिया, समझो वह मृत्युञ्जय बन गया।

आइए हम सब मृत्युञ्जय बनें और इस मन्त्र का पाठ करें-----

"त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धानान्मृत्युोर्मुक्षीय माsमृतात्।।"