Thursday, February 18, 2016

Puspak viman !! पुष्पक विमान

!! पुष्पक विमान !!

वाल्मीकीय रामायण उत्तरकाण्ड के पन्द्रहवें सर्ग में लिखा है -

देवोपवाह्यमक्षय्यं सदा दृष्टिमनःसुखम् ॥४०॥ 
बहवाश्चर्यं भक्तिचित्रं ब्रह्मणा परिनिर्मितम् । 
निर्मितं सर्वकामैस्तु मनोहरमनुत्तमम् ॥४१॥ 
न तु शीतं न चोष्णं च सर्वर्त्तुसुखदं शुभम् ॥

ब्रह्मा (विश्वकर्मा) द्वारा निर्मित विमान देवताओं का वाहन न टूटने फूटने वाला, देखने में सदा सुन्दर और चित्त को प्रसन्न करने वाला था । उसके भीतर अनेक प्रकार के आश्चर्यजनक चित्र थे । उसकी दीवारों पर नाना प्रकार के बेल बूटे बने हुये थे, जिससे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी । सब प्रकार की अभीष्ट वस्तुओं से सम्पन्न मनोहर और परम उत्तम था । न अधिक ठंडा न अधिक गर्म, किन्तु सभी ऋतुओं में सुखदायक और मंगलकारी था ।

काञ्चनस्तम्भसंवीतं वैदूर्यमणितोरणम् ॥३८॥ मुक्ताजालप्रतिच्छन्नं सर्वकालफलद्रुमम् । 
मनोजवं कामगमं कामरूपं विहंगमम् ॥३९॥  मणिकाञ्चनसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ॥४०॥

उस विमान के खम्भे तथा फाटक स्वर्ण और वैदूर्यमणि के बने हुये थे । वह सब ओर से मोतियों की जाली से ढ़का हुआ था । उसके भीतर ऐसे वृक्ष लगे हुये थे जो सभी ऋतुओं में फल देने वाले थे । उसका वेग मन के समान तीव्र था । यात्रियों की इच्छानुसार सब स्थानों पर जा सकता था । तथा चालक की इच्छानुसार छोटा बड़ा रूप भी धारण कर लेता था । उस आकाशचारी विमान में मणि और स्वर्ण की सी सीढ़ियां तथा तपाये हुए सोने की वेदियां बनी हुईं थीं