Monday, January 4, 2016

How old is universe ! सृष्टि की आयु

!! सृष्टि की आयु !!

सृष्टि उत्पन्न होने के पश्चात् जब तक स्थिर रहती है, उस समय को शास्त्रीय परिभाषा में एक कल्प कहते हैं । इसी की दूसरी संज्ञा सहस्रमहायुग भी है । यह कल्प चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षों का होता है । इसमें वेद का प्रमाण है –

शतं तेऽयुतं हायनान् द्वे युगे त्रीणि चत्वारि कृण्मः । विश्वेदेवास्तेऽनुमन्यन्तामहृणीयमानाः ॥ (अथर्ववेद काण्ड ८, अनु० १, मं० २१॥

इसका अर्थ यह है कि दस हजार सैंकड़ा अर्थात् दस लाख तक शून्य देने पर अनुक्रम पूर्वक दो, तीन और चार ये अंक रखने से सृष्टि की आयु का ब्यौरा वा हिसाब प्राप्त होता है ।

वेदों के साक्षात् कृतवर्मा ऋषियों ने सृष्टि विज्ञान को भली भांति समझा और लोक कल्याणार्थ इसका प्रचलन किया । 
सूर्य सिद्धान्त (जो गणित ज्योतिष का सच्चा और सुप्रसिद्ध ग्रन्थ है, जिसके रचयिता मय नामक महाविद्वान् थे ) में लिखा है -

अल्पावशिष्टे तु कृतयुगे मयो नाम महासुरः

अर्थात् कृतयुग (सतयुग) जब कुछ बचा हुआ था, तब मय नामक विद्वान् ने यह ग्रन्थ बनाया । आज से इक्कीस लाख, पैंसठ सहस्र अड़सठ (२१, ६५,०६८) वर्ष पुराना यह ग्रन्थ है । क्योंकि वर्तमान कलियुग के पांच सहस्र अड़सठ (५०६८) वर्ष बीत चुके । इस से पूर्व आठ लाख चौंसठ सहस्र (८,६४,०००) वर्ष द्वापर के, बारह लाख छियानवें सहस्र (१२,९६,०००) वर्ष त्रेता युग के बीत चुके हैं । इन सबको मिलाकर २१६५०६८ वर्ष पुराना तो कम से कम यह सूर्य सिद्धान्त नामक ग्रन्थ है ।
 कुछ समय इस में सतयुग के अन्त का भी मिलाया जा सकता है । लाखों वर्ष पुराने इस ज्योतिष के ग्रन्थ में भी सृष्टि की आयु वेद के अनुसार ही लिखी है –

युगानां सप्ततिः सैका मन्वन्तरमिहोच्यते । कृताब्दसंख्यस्तस्यान्ते सन्धिः प्रोक्तो जलप्लवः ॥ ससन्धयस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयाश्चतुर्दश । कृतप्रमाणः कल्पादौ सन्धिः पञ्चदशः स्मृतः ॥

अर्थात् इकहत्तर (७१) चतुर्युगियों को एक मन्वन्तर कहते हैं । एक कल्प में सन्धिसहित ऐसे-ऐसे चौदह मन्वन्तर होते हैं । कल्प के प्रारम्भ में तथा प्रत्येक मन्वन्तर के अन्त में जो सन्धि हुवा करती है वह भी एक सतयुग के वर्षों के समान अर्थात् सत्रह लाख अठाईस सहस्र (१७,२८,०००) वर्षों की होती है । इस प्रकार एक कल्प में पन्द्रह सन्धियां होती हैं । इसकी गणना निम्न प्रकार से हुई -

चतुर्युगी अथवा महायुग

नामयुग                 युग के वर्षों की निश्चित संख्या'
१ सतयुग (कृतयुग)        १७,२८००० वर्ष
२ त्रेतायुग                    १२,९६,००० वर्ष
३ द्वापर युग                    ८,६४००० वर्ष
४ कलियुग                      ४,३२००० वर्ष
कुल योग                       ४३,२०,००० वर्ष

तेतालीस लाख बीस सहस्र वर्षों की एक चतुर्युगी होती है जिसका नाम महायुग भी है । यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि कलियुग से दुगुना द्वापर, तीन गुणा त्रेता और चार गुणा सतयुग (कृतयुग) होता है । उपर्युक्त एक सहस्र महायुग का एक कल्प होता है जो कि सृष्टि की आयु है । इस का वर्णन सूर्य सिद्धान्त में निम्न प्रकार से है -

इत्थं युगसहस्रेण भूतसंहारकारकः । कल्पं ब्राह्ममहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती ॥

वह जगद्विधाता परमेश्वर एक सहस्र महायुग तक इस सृष्टि को स्थित रखता है । इसी काल को एक ब्राह्म दिन कहते हैं । इसी का नाम एक कल्प है । जितना काल एक ब्राह्म दिन का होता है उतना ही ब्राह्मरात्रि अर्थात् प्रलयकाल होता है । इस गणना को मन्वन्तरों के अनुसार इस प्रकार गिनते हैं । तेतालीस लाख बीस सहस्र वर्षों का एक महायुग अथवा एक चतुर्युगी । इन इकहत्तर चतुर्युगियों का नाम एक मन्वन्तर । इसका काल तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस सहस्र (३०,६७, २०,०००) वर्ष हुवा । यह काल सन्धि रहित मन्वन्तरों का हुवा । चौदह मन्वन्तरों के अन्त की चौदह सन्धियां तथा सर्गादि की एक सन्धि ये कुल मिलाकर पन्द्रह सन्धियां हुईं । एक सन्धि का काल एक कृतयुग जितना अर्थात् सतरह लाख, अठाईस हजार वर्ष (१७, २८,०००) होता है। इस प्रकार पन्द्रह सन्धियों का काल दो करोड़, उनसठ लाख और बीस सहस्र वर्ष हुवा । इस को चौदह मन्वन्तरों के पूर्वोक्त ४२९४०८०००० काल में जोड़ने से सृष्टि की आयु ४,३२,००००००० वर्ष ठीक हो जाती है ।

महर्षि व्यास जी ने महाभारत में इस विषय में उल्लेख किया है -

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ 
(गीता अ० ८, श्लोक १७)

एक हजार चतुर्युगियों तक एक ब्राह्म दिवस होता है तथा उतनी ही बड़ी उसकी ब्राह्मरात्रि भी होती है । यहां सृष्टि और प्रलय की आयु का वर्णन दूसरे प्रकार से कर दिया है