Monday, May 2, 2016

गायत्री मंत्र में छिपा है 'ॐ' का रहस्‍य


गायत्री मंत्र  छिपा है 'ॐ' का रहस्य 

ऋगवेद में मौजूद है गायत्री मंत्र। अनादि काल से सनातनधर्मी इसे सर्वाधिक श्रद्धेय मंत्र के रूप में स्वीकार करते आए हैं। ये मंत्र इस प्रकार है। 

'ॐ भूर्भुव: स्व: 
तत्सवितुर्वरेण्यं 
भर्गो देवस्य धीमहि, 
धीयो यो न: प्रचोदयात्'

दरअसल गायत्री मंत्र की शुरुआत ही 'ॐ' ध्वनि से ही होती है। आदि शंकराचार्य के अनुसार गायत्री मंत्र प्रणव 'ॐ' का ही विस्तृत रूप है। आध्यात्मिक जीवन का श्रीगणेश इसी मंत्र के चिंतन से आरंभ होता है। आइए गायत्री मंत्र और 'ॐ' के रहस्य को इस प्रकार समझने का प्रयास करें। 

नाम की खोज

ॐ  -    ओम (प्रणव अक्षर)
भूः  -   भू-मंडल, भूलोक
भुवः - अंतरिक्ष लोक, गृह मंडल
स्वः -  स्वर्ग लोक, अंतरिक्ष में चक्कर लगाती आकाशगंगाएं

रूप की खोज 

तत् -  वह परमात्मा
सवित – ईश्वर, बनाने वाला (सूरज)
वरेण्यम - वंदना करने योग्य

उपासना  

भर्गो -  तेज का, प्रकाश का
देवस्य -  देवताओं का
धीमहि -  ध्यान करते हैं

प्रार्थना 

धियो - बुद्धि
यो - जो कि
नः - हमें
प्रचोदयात - सन्मार्ग पर प्रेरित करें

इस प्रकार 'ॐ' तथा गायत्री मन्त्र का पूर्ण अर्थ बनता है : 
''हमारा पृथ्वी मंडल, गृह मंडल, अंतरिक्ष मंडल तथा सभी आकाशगंगाओं की गतिशीलता से उत्पन्न महान शोर ही ईश्वर की प्रथम पहचान प्रणव अक्षर 'ॐ' है और वह परमात्मा जो अनेकानेक रूप प्रकाश के रूप में प्रकट है, वंदनीय है। उस परमात्मा के प्रकाश का हम ध्यान करें और यह प्रार्थना भी करें कि  वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाये रखे ताकि सद्बुद्धि हमारे चंचल मन को नियंत्रण में रख सके और साधक को ब्रह्म की अनुभूति करा सके। 

'ॐ' का परिचय 

अक्षरात्मक 

इसका वर्णन वेद, उपनिषद विशेषकर माण्डूक्योपनिषद में मिलता है। इसके 12 मन्त्रों में केवल 'ॐ' के विभिन्न पदों, उसके स्वरूप, उसकी विभिन्न मात्राओं तथा तन्मात्रों आदि का वर्णन है। 

ध्वन्यात्मक 

इसका वर्णन करते हुए महर्षि पतंजलि समाधिपाद के 27वें सूत्र में कहते हैं कि 'तस्य वाचक प्रणवः' अर्थात्, उस ईश्वर नामक चेतन तत्व विशेष के अस्तित्व का बोध करने वाला शब्द ध्वन्यात्मक 'ॐ' है। 

अनेक संत महात्माओं ने भी 'ॐ' के ध्वन्यात्मक स्वरुप को ही ब्रह्म माना है तथा 'ॐ' को "शब्द ब्रह्म" भी कहा है।

'ॐ' का उद्गम 

अब मुख्य प्रश्न यह है कि यदि 'ॐ'  एक दिव्य ध्वनि है तो इसका उद्गम क्या है? यदि ब्रह्माण्ड में कतिपय ध्वनि तरंगे व्याप्त हैं तो इनका कारक क्या है? क्योंकि, यह तो विज्ञान का सामान्य सा नियम है कि कोई भी ध्वनि स्वतः उत्पन्न नहीं हो सकती। जहां हरकत होगी वहीं ध्वनि उत्पन्न होगी चाहे वह इन स्थूल कानों से सुनाई दे या नहीं। 

ऊपर लिखे गायत्री मन्त्र के अर्थ में कहा गया कि हमारा पृथ्वी मंडल, गृह मंडल, अंतरिक्ष मंडल तथा सभी आकाशगंगाओं की गतिशीलता से उत्पन्न महान शोर ही ईश्वर की प्रथम पहचान प्रणव अक्षर 'ॐ' है। 

वैज्ञानिक चिंतन

विभिन्न ग्रहों से आ रही विभिन्न ध्वनियों को ध्यान की उच्चतम स्थित में जब मन पूरी तरह विचार शून्य हो, सुना जा सकता है। ऋग्वेद के नादबिंदु उपनिषद् में आंतरिक और आत्मिक मंडलों में शब्द की ध्वनि को समुद्र की लहरों, बादल, ढोल, पानी के झरनों, घंटे जैसी आवाज़ के रूप में सुने जाने का वर्णन है। हठ योग प्रदीपिका में भंवर की गुंजार, घुंगरू, शंख, घंटी, खड़ताल, मुरली, मृदंग, बांसुरी और शेर की गरज जैसी ध्वनियों का वर्णन है। 

गायत्री मन्त्र में 'ॐ' को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि पृथ्वी मंडल, गृह मंडल एवं अंतरिक्ष में स्थित आकाशगंगाओं की गतिशीलता से उत्पन्न सामूहिक ध्वनियां ही 'ॐ' की दिव्य ध्वनि है। यह अब कपोल कल्पना नहीं वास्तविकता है। विभिन ग्रहों की ध्वनियों को अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड किया है, इन्हें प्लैनेट साउंड के नाम से इंटरनेट पर भी सर्च करके सुना जा सकता है। 

बहुत ज्यादा शक्तिशाली है मंत्र 'ॐ'

विद्वानों का मत है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सदा 'ॐ' की ध्वनि ही गतिमान रहती है। 'ॐ' को सर्वाधिक शक्तिशाली माना गया है। किसी भी मंत्र से पहले यदि 'ॐ' जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति-सम्पन्न हो जाता है। किसी देवी-देवता, ग्रह या अन्य मंत्रों के पहले 'ॐ' लगाना आवश्यक होता है, जैसे, श्रीराम का मंत्र, 'ॐ रामाय नमः', विष्णु का मंत्र, 'ॐ विष्णवे नमः', शिव का मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' आदि। 

कहा जाता है कि 'ॐ' से रहित कोई मंत्र फलदायी नही होता, चाहे उसका कितना भी जाप हो। वैसे मंत्र के रूप में एकमात्र 'ॐ' भी पर्याप्त है। 'ॐ' का दूसरा नाम प्रणव (परमेश्वर) है। "तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है। इस तरह प्रणव अथवा 'ॐ' एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। 'ॐ' अक्षर है इसका क्षरण अथवा विनाश नहीं होता। छान्दोग्योपनिषद् में ऋषियों ने कहा है, "ॐ इत्येतत् अक्षरः"। अर्थात्, 'ॐ' अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।

मूल ध्वनियों को जानें 

अ उ म् के मेल से ही बना है 'ॐ'। इनमें, "अ" का अर्थ है आर्विभाव या उत्पन्न होना, "उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास, "म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना। 'ॐ' सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का प्रतिबिंब है। 

ध्यान बिन्दुपनिषद् के अनुसार 'ॐ' मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता। सनातन धर्म ही नहीं, भारत के अन्य धर्म-दर्शनों में भी 'ॐ' को महत्व प्राप्त है। बौद्ध-दर्शन में "मणिपद्मेहुम" का प्रयोग जप एवं उपासना के लिए प्रचुरता से होता है। इस मंत्र के अनुसार 'ॐ' को "मणिपुर" चक्र में अवस्थित माना जाता है। यह चक्र दस दल वाले कमल के समान है। जैन दर्शन में भी 'ॐ' के महत्व को दर्शाया गया है। 

श्रीगुरु नानक देव जी ने 'ॐ' के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है, " इक ओंकार सतनाम करता पुरख निर्भौ निर्वैर अकाल मूरत....''। यानी 'ॐ' सत्यनाम जपने वाला पुरुष निर्भय, वैर-रहित एवं "अकाल-पुरुष के" सदृश हो जाता है। 'ॐ' इस अनंत ब्रह्माण्ड का नाद है (वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों रूपों में) एवं मनुष्य के अंत: स्थल में स्थित परम् ब्रह्म का प्रतीक।