Thursday, September 24, 2015

"ॐ" ब्रह्माण्ड का नाद है

"ॐ" ब्रह्माण्ड का नाद है
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ओ३म् (ॐ) या ओंकार का नामांतर प्रणव है। यह ईश्वर का वाचक है।
ईश्वर के साथ ओंकार का वाच्य-वाचक-भाव संबंध नित्य है,
सांकेतिक नहीं।
संकेत नित्य या स्वाभाविक संबंध को प्रकट करता है।
सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम ओंकाररूपी प्रणव का ही स्फुरण होता है।
तदनंतर सात करोड़ मंत्रों का आविर्भाव होता है।
इन मंत्रों के वाच्य आत्मा के देवता रूप में प्रसिद्ध हैं। ये देवता माया के ऊपर विद्यमान रह कर मायिक सृष्टि का नियंत्रण करते हैं।
महत्व तथा लाभ---
ओउ्म तीन शब्द 'अ' 'उ' 'म' से मिलकर बना है जो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा त्रिलोक भूर्भुव: स्व: भूलोक भुव: लोक तथा स्वर्ग लोक का प्रतीक है।
पद्माशन में बैठ कर इसका जप करने से मन को शांति तथा एकाग्रता की प्राप्ति होती है,
वैज्ञानिकों तथा ज्योतिषियों को कहना है कि ओउ्म तथा एकाक्षरी मंत्र का पाठ करने में दाँत, नाक, जीभ सब का उपयोग होता है
जिससे हार्मोनल स्राव कम होता है तथा ग्रंथि स्राव को कम करके यह शब्द कई बीमारियों से रक्षा तथा शरीर के सात चक्र (कुंडलिनी) को जागृत करता है।
तस्य वाचकः प्रणवः==उस ईश्वर का वाचक प्रणव 'ॐ' है।
अक्षरका अर्थ जिसका कभी क्षरण न हो। ऐसे तीन अक्षरों— अ उ और म से मिलकर बना है ॐ।
माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डसे सदा ॐ की ध्वनी निसृत होती रहती है।
हमारी और आपके हर श्वास से ॐ की ही ध्वनि निकलती है।
यही हमारे-आपके श्वास की गति को नियंत्रित करता है। माना गया है कि अत्यन्त पवित्र और शक्तिशाली है
ॐ। किसी भी मंत्र से पहले यदि ॐ जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध और शक्ति-सम्पन्न हो जाता है।
किसी देवी-देवता, ग्रह या ईश्वर के मंत्रों के पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है,
जैसे, श्रीराम का मंत्र — ॐ रामाय नमः, विष्णु का मंत्र — ॐ विष्णवे नमः, शिव का मंत्र — ॐ नमः शिवाय, प्रसिद्ध हैं।
कहा जाता है कि ॐ से रहित कोई मंत्र फलदायी नही होता, चाहे उसका कितना भी जाप हो।
मंत्र के रूप में मात्र ॐ भी पर्याप्त है। माना जाता है कि एक बार ॐ का जाप हज़ार बार किसी मंत्र के जाप से महत्वपूर्ण है।
ॐ का दूसरा नाम प्रणव (परमेश्वर) है।
"तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस परमेश्वर का वाचक प्रणव है।
इस तरह प्रणव अथवा ॐ एवं ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। ॐ अक्षर है इसका क्षरण अथवा विनाश नहीं होता।
छान्दोग्योपनिषद् में ऋषियों ने गाया है -
"ॐ इत्येतत् अक्षरः"अर्थात् "ॐ अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।
"ॐ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का प्रदायक है।
मात्र ॐ का जप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली।
कोशीतकी ऋषि निस्संतान थे, संतान प्राप्तिके लिए उन्होंने सूर्यका ध्यान कर ॐ का जाप किया तो उन्हे पुत्र प्राप्ति हो गई।
गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में उल्लेख है कि जो "कुश" के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हज़ार बार ॐ रूपी मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
नानक क्यों कहते हैं---गुरु नानक जी का शब्द एक ओंकार सतनाम बहुत प्रचलित तथा शत्प्रतिशत सत्य है। एक ओंकार ही सत्य नाम है।
राम, कृष्ण सब फलदायी नाम ओंकार पर निहित हैं तथा ओंकार के कारण ही इनका महत्व है।
बाँकी नामों को तो हमने बनाया है परंतु ओंकार ही है जो स्वयंभू है तथा हर शब्द इससे ही बना है।
हर ध्वनि में ओउ्म शब्द होता है।
ओ ओंकार आदि मैं जाना।
लिखि औ मेटें ताहि ना माना।।
ओ ओंकार लिखे जो कोई।
सोई लिखि मेटणा न होई।।
"ओम सतनाम कर्ता पुरुष निभौं निर्वेर अकालमूर्त"यानी ॐ सत्यनाम जपनेवाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं "अकाल-पुरुष के" सदृश हो जाता है।
"ॐ" ब्रह्माण्ड का नाद है एवं मनुष्य के अन्तर में स्थित ईश्वर का प्रतीक।
आज दैवपित्रकार्य अमावस्या की सुप्रभात आप सभी भाईयो और बहनो के जीवन में आरोग्य, सदभावना, सहिष्णुता एवम शक्ति की भगवान् श्री रामजी से कामना करता हूँ। आप का जीवन मंगलमय हो
जय श्री राम